काशी के एक आश्रम में साल भर में 55 बुजुर्गों की मौत — और उनके परिजन शव लेने तक नहीं आए। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बदलते पारिवारिक ढांचे, आर्थिक तर्कीकरण और सामाजिक पूंजी के टूटने की कहानी है। फ्रॉम,वेबर, गिडेन्स और गांधी-आंबेडकर की दृष्टि से इस संकट को समझने की कोशिश।
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